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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....डा श्याम गुप्त


                           

हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....
              कुछ आलेखों में हिन्दी के विषय में विविध मत प्रस्तुत किये गए हैं | देखिये ...अच्छी भावना होते हुए भी किस प्रकार  भाषा  की गहन भाव-समझ न होते हुए किस प्रकार के नकारात्मक भाव संप्रेषित होते हैं....
चिरत-समाचार-१-तुलसी बड़े या कबीर ?

१- चित्र समाचार -१.--नई रचनाशीलता --ज्ञानरंजन-..साहित्यकार......
--रचनाशीलता सदा ही नई होती है -ये नयी रचनाशीलता क्या होती है.......  -----जितने बड़े लोग हैं सब विफल हैं,कबीर और मुक्तिबोध नाकाम हैं|.......हिन्दू समाज तुलसी दास को ही मानता है कबीर को नहीं... .....अर्थात लेखक के अनुसार कबीर बड़े हैं ..मुक्तिबोध बड़े हैं ..तुलसी नहीं 
---और कबीर को कौन नहीं मानता  ??साहित्यकार जी .... इस भारत में ..हिन्दू-मुसलमान सब मानते हैं...कबीर साहित्य के अनूठेपन की विरुदावलियाँ गाई जाती हैं.. तुलसी, तुलसी हैं- कबीर, कबीर .......
--- अब आप ही सोचिये | कैसी हिन्दी की, साहित्य की , देश-समाज  की सेवा है यह ...
समाचार चित्र-२-शुद्ध हिन्दी ,भुस व गिद्ध





चित्र-समाचार -२-.( आलेख-कांतिकुमार जैन , पूर्व-प्राध्यापक, लेखक )-.  मल्होत्रा साहब   के लिए शुद्ध हिन्दी गिद्ध है वह भी भुस से भरा हुआ .....

---और उन्हीं महोदय को ..गुलेरी जी की हिन्दी कहानी ...में लाणी होरा ... के अर्थ के लिए जर्मन तक जाना पड़ा ..होरा से ...जर्मन हर का अर्थ जोडने हेतु....
---- जबकि ऋग्वेद...अथर्व वेद में ...हारा शब्द ...आदि-शक्ति ..महामाया के लिए प्रयुक्त है ....... हारा ...राधा, सीता ,लक्ष्मी  अर्थात  आदि- शक्ति--आत्मा, आत्मशक्ति  तथा  ....हरे ..हरी ..शीघ्रता से प्रसन्न होने वाले देव....इसीलिये हरे कृष्ण ..हरे राम...कहाजाता है...अर्थात शक्ति से युक्त देवता ...श्याम या राम ....अतः होरा ..स्त्री के हेतु प्रयोग है...लाणी -होरा = लावनी, लोनी, सलोनी, सुन्दर, लाडली , प्रिय --- शक्ति-रूप, आदरणीय  स्त्री-पत्नी-प्रेमिका  ...... हर . हरें ....
----हर हिटलर शब्द हिटलर ने हरे राम..हरे कृष्ण से लिया होगा  ...जर्मन लोग वैदिक साहित्य के ज्ञाता थे...
लाणी होरा और हर

----शुद्ध हिन्दी और अच्छी हिन्दी में क्या अंतर है....क्या शुद्ध वस्तु अच्छी नहीं होगी ...क्या अर्थ निकालेंगे आप इस कथन का.....
समाचार-चित्र -३- अब एक व्यंगकार की भाषा का हिन्दी पर व्यंग्य देखिये ....हिन्दी राजनीति के बंदरों के हाथ पड गया वह उस्तरा है .जिससे खेलता हुआ वह सारे राष्ट्र को लुहूलुहान कर रहा है....
----अर्थात लेखक के अनुसार हिन्दी एक उस्तरा है, धार वाला हथियार ....बाल बनाने हेतु एक अस्त्र....
---वाह! क्या उपाधि है हिन्दी की ...व्यर्थ के व्यंग्य-आलेख  लिखते लिखते उसी प्रकार की अनुपयुक्त भाषा भी होजाती है.....


---तभी तो कबीर ने कहा ....
"ह्रदय तराजू तौल कर तब मुख बाहर आनि |"...(..तब तू लिखना ठानि ....)......

शनिवार, 15 सितंबर 2012

...त्रुटिपूर्ण सोच के कथन और हिन्दी का दुर्भाग्य ...डा श्याम गुप्त

                          
                 लम्हों  ने खता  की और सदियों ने सज़ा पाई .....यही हाल है हिन्दी का भी...प्रायः अच्छे भाव होते हुए भी कथन में .....त्रुटिपूर्ण  विचार-भाव के कारण वह  भाव-सम्प्रेषण नहीं होपाता जो होना चाहिए ...अतः हिन्दी आज उतनी तेजी से  प्रगति पथ पर अग्रसर नहीं हो पारही जितना उसे होना चाहिए.....देखिये कुछ असम्प्रक्त व अस्पष्ट विचार भाव .....( उपरोक्त चित्र-समाचार में आलेख..)

कथन १----"मैं जब उर्दू में गज़ल कहता हूँ तो हिन्दी  मुस्कुराती है|
                   लिपट जाता हूँ माँ से तो, मौसी मुस्कुराती है ||...."
-------अर्थात हिन्दी हमारी ( हम भारतीयों की ) माँ नहीं मौसी है माँ तो उर्दू है ..... क्या भावार्थ है इस कथन का/ शे'र का  जिसका जोर-जोर से डंका पीटा जाता है | यही भाव हैं हमारे महानुभावों के जिसमें क्या कोई गूढ़ अर्थ छुपा है...जो हिन्दी से हमें दूर करे...

कथन -२..राम मनोहर लोहिया ...हिन्दी व उर्दू को को सती व  पार्वती कहते थे .....
--------या तो लोहिया जी सती और पार्वती का अर्थ व कथा से अनभिग्य थे  या उर्दू व हिन्दी के वास्तविक ज्ञान से....... सती अपूर्ण थीं और पार्वती शक्ति का १०८ वाँ  अवतार और सम्पूर्ण ....क्या  हिन्दी  व  उर्दू की यही स्थिति है ??

कथन ३....लोगों में सबसे बड़ी भ्रान्ति यही है कि भाषाओं का निर्माण लोग करते हैं ...असलियत है कि भाषाओं का बनाने-बिगाडने का कार्य एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक शक्तियां करती  हैं ...लेखक ..
------क्या लेखक यह समझते हैं कि ये एतिहासिक आदि लेख में वर्णित शक्तियां ...लोग नहीं हैं ...क्या वे लोगों( मनुष्य--जन --पब्लिक)  द्वारा संचालित न होकर किसी पराशक्ति द्वारा संचालित होती हैं | लेखक का अभिप्रायः लोग से क्या है ? क्या लोग ( अर्थात लोक -जन ) कोई गर्हित सम्प्रदाय है ? कथन के दोनों विभागों  में क्या अंतर है ?
--- लेखक पूर्ण रूप से भ्रमित प्रतीत होता है ...... हमें अपने कथन व विचार रखते समय उचित सोच-विचार करना चाहिए कि उसका सम्प्रेषणीयता क्या होगी ....

------------यही  हिन्दी का दुर्भाग्य है ....

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

आज का छिद्रान्वेषण.....राष्ट्रपति...महिलायें व समाज..... डा श्याम गुप्त.....

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
           

बिंदु-१ .....           महिलायें  सामाजिक बुराई के खिलाफ आगे आयें ....निश्चय ही अच्छा नारा है .....परन्तु यदि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च स्तर की महिलायें  अपना नाम ... प्रतिभा  देवीसिंह पाटिल....एवं अभी हाल में ही चिकित्सा वि विद्यालय की कुलपति पद पर सुशोभित ...डा सरोज चूडामणि  गोपाल ..... अर्थात ....पति (..देवीसिंह ...व गोपाल) के नाम ....के बिना अपनी स्वतंत्र  पहचान ( आइडेंटिटी ) नहीं स्थापित कर सकती हैं तो ......हम क्या अपेक्षा रखें स्वयं महिलाओं से .?? ........क्या यह नाम -स्वरुप ...प्रेम व समर्पण के वशीभूत रखा जाता है  या पारिवारिक, परम्परा व पति के दबाव स्वरुप .....?
बिंदु-२.....               क्या माननीय राष्ट्रपति महोदया ...या हिन्दी प्रदेश के ह्रदय प्रदेश की माननीय मुख्य मंत्री  या वे सभी महान महिलायें, महिला संगठन , महिला कालेज के पदाधिकारी व छात्र-संगठन , महान पूर्व छात्राएं व महान छात्राएं .......उदघाटन पट्ट को देश की भाषा  राष्ट्र-भाषा हिन्दी में नहीं करा सकती थीं जो गुलामी की प्रतीक भाषा अंग्रेज़ी में लिखा गया |