प्रायः प्रगतिवादी विज्ञजन, आंग्ल संस्कृति/ वैचारिक प्रभाव वश ..पोज़िटिव थिंकिंग,आधे भरे गिलास को देखो ....आदि कहावतें कहते पाए जाते हैं ...परन्तु गुणात्मक ( धनात्मक + नकारात्मक ) सोच ..सावधानी पूर्ण सोच होती है..जो आगामी व वर्तमान खतरों से आगाह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है...
मंगलवार, 6 नवंबर 2012
सोमवार, 1 अक्टूबर 2012
गुरुवार, 20 सितंबर 2012
हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....डा श्याम गुप्त
हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....
कुछ आलेखों में हिन्दी के विषय में विविध मत प्रस्तुत किये गए
हैं | देखिये ...अच्छी भावना होते हुए भी किस प्रकार भाषा की गहन
भाव-समझ न होते हुए किस प्रकार के नकारात्मक भाव संप्रेषित होते हैं....| चिरत-समाचार-१-तुलसी बड़े या कबीर ? |
१- चित्र समाचार -१.--नई रचनाशीलता --ज्ञानरंजन-..साहित्यकार......
--रचनाशीलता सदा ही नई होती है -ये नयी रचनाशीलता क्या होती है....... -----जितने बड़े लोग हैं सब विफल हैं,कबीर और मुक्तिबोध नाकाम हैं|.......हिन्दू समाज तुलसी दास को ही मानता है कबीर को नहीं... .....अर्थात लेखक के अनुसार कबीर बड़े हैं ..मुक्तिबोध बड़े हैं ..तुलसी नहीं
---और कबीर को कौन नहीं मानता ??साहित्यकार जी .... इस भारत में ..हिन्दू-मुसलमान सब मानते हैं...कबीर साहित्य के अनूठेपन की विरुदावलियाँ गाई जाती हैं.. तुलसी, तुलसी हैं- कबीर, कबीर .......
--- अब आप ही सोचिये | कैसी हिन्दी की, साहित्य की , देश-समाज की सेवा है यह ...
| समाचार चित्र-२-शुद्ध हिन्दी ,भुस व गिद्ध |
चित्र-समाचार -२-.( आलेख-कांतिकुमार जैन , पूर्व-प्राध्यापक, लेखक )-. मल्होत्रा साहब के लिए शुद्ध हिन्दी गिद्ध है वह भी भुस से भरा हुआ .....
---और उन्हीं महोदय को ..गुलेरी जी की हिन्दी कहानी ...में लाणी होरा ... के अर्थ के लिए जर्मन तक जाना पड़ा ..होरा से ...जर्मन हर का अर्थ जोडने हेतु....
---- जबकि ऋग्वेद...अथर्व वेद में ...हारा शब्द ...आदि-शक्ति ..महामाया के लिए प्रयुक्त है ....... हारा ...राधा, सीता ,लक्ष्मी अर्थात आदि- शक्ति--आत्मा, आत्मशक्ति तथा ....हरे ..हरी ..शीघ्रता से प्रसन्न होने वाले देव....इसीलिये हरे कृष्ण ..हरे राम...कहाजाता है...अर्थात शक्ति से युक्त देवता ...श्याम या राम ....अतः होरा ..स्त्री के हेतु प्रयोग है...लाणी -होरा = लावनी, लोनी, सलोनी, सुन्दर, लाडली , प्रिय --- शक्ति-रूप, आदरणीय स्त्री-पत्नी-प्रेमिका ...... हर . हरें ....
----हर हिटलर शब्द हिटलर ने हरे राम..हरे कृष्ण से लिया होगा ...जर्मन लोग वैदिक साहित्य के ज्ञाता थे...
| लाणी होरा और हर |
----शुद्ध हिन्दी और अच्छी हिन्दी में क्या अंतर है....क्या शुद्ध वस्तु अच्छी नहीं होगी ...क्या अर्थ निकालेंगे आप इस कथन का.....
समाचार-चित्र -३- अब एक व्यंगकार की भाषा का हिन्दी पर व्यंग्य देखिये ....हिन्दी राजनीति के बंदरों के हाथ पड गया वह उस्तरा है .जिससे खेलता हुआ वह सारे राष्ट्र को लुहूलुहान कर रहा है....
----अर्थात लेखक के अनुसार हिन्दी एक उस्तरा है, धार वाला हथियार ....बाल बनाने हेतु एक अस्त्र....
---वाह! क्या उपाधि है हिन्दी की ...व्यर्थ के व्यंग्य-आलेख लिखते लिखते उसी प्रकार की अनुपयुक्त भाषा भी होजाती है.....
---तभी तो कबीर ने कहा ....
"ह्रदय तराजू तौल कर तब मुख बाहर आनि |"...(..तब तू लिखना ठानि ....)......
शनिवार, 15 सितंबर 2012
अंग्रेज़ी में उपन्यास लिखिए.....अंग्रेजों के लिए और निश्चित ही बड़े -लेखक का खिताब पाइए ....डा श्याम गुप्त
समाचार-चित्र --..अंग्रेज़ी में उपन्यास लिखिए.....अंग्रेजों के लिए और निश्चित ही बड़े -लेखक का खिताब पाइए ..... देखिये ...तथाकथित प्रसिद्द ( हमें तो पता नहीं ये कब,कैसे व क्यों प्रसिद्ध हुए व किसने पड़े )..उपन्यासों आदि का नाम ..'द बेस्ट थिंग अबाउट यूं यूज '....'आई एम् एनदर यू",
'लाइसेंस टूलिव '.....'द परफेक्ट वर्ल्ड ',,,'अन्फोल्डिंग द गोडेस विदिन यूं'....
'काउंट योर चिकिंस बिफोर दे हैच '...द मंक टू सोल्ड हिज फेरारी '..
'स्टे हंगरी '......
---पता नहीं ये सब पुस्तकें किन लोगों के लिए लिखी गयी हैं...
विदेशी भाषा में और क्यों ....क्या ये हिन्दी, हिन्दुस्तान का खाने वाले लोग ,
हिन्दी में नहीं लिख सकते ...और क्यों .......???
------- ऐसे हज़ारों उपन्यास जो हिन्दी में हिन्दी लेखकों द्वारा लिखे गए हैं , उनका कोई ज़िक्र ही नहीं होता क्योंकि...वे हिन्दी जैसी बेकार भाषा में लिखते हैं और उन्हें बाज़ार का भाव ...कलम बेचना-खरीदना नहीं आता ....
'लाइसेंस टूलिव '.....'द परफेक्ट वर्ल्ड ',,,'अन्फोल्डिंग द गोडेस विदिन यूं'....
'काउंट योर चिकिंस बिफोर दे हैच '...द मंक टू सोल्ड हिज फेरारी '..
'स्टे हंगरी '......
---पता नहीं ये सब पुस्तकें किन लोगों के लिए लिखी गयी हैं...
विदेशी भाषा में और क्यों ....क्या ये हिन्दी, हिन्दुस्तान का खाने वाले लोग ,
हिन्दी में नहीं लिख सकते ...और क्यों .......???
------- ऐसे हज़ारों उपन्यास जो हिन्दी में हिन्दी लेखकों द्वारा लिखे गए हैं , उनका कोई ज़िक्र ही नहीं होता क्योंकि...वे हिन्दी जैसी बेकार भाषा में लिखते हैं और उन्हें बाज़ार का भाव ...कलम बेचना-खरीदना नहीं आता ....
...त्रुटिपूर्ण सोच के कथन और हिन्दी का दुर्भाग्य ...डा श्याम गुप्त
लम्हों ने खता की और सदियों ने सज़ा पाई .....यही
हाल है हिन्दी का भी...प्रायः अच्छे भाव होते हुए भी कथन में
.....त्रुटिपूर्ण विचार-भाव के कारण वह भाव-सम्प्रेषण नहीं होपाता जो
होना चाहिए ...अतः हिन्दी आज उतनी तेजी से प्रगति पथ पर अग्रसर नहीं हो
पारही जितना उसे होना चाहिए.....देखिये कुछ असम्प्रक्त व अस्पष्ट विचार भाव
.....( उपरोक्त चित्र-समाचार में आलेख..)
कथन १----"मैं जब उर्दू में गज़ल कहता हूँ तो हिन्दी मुस्कुराती है|
लिपट जाता हूँ माँ से तो, मौसी मुस्कुराती है ||...."
-------अर्थात हिन्दी हमारी ( हम भारतीयों की ) माँ नहीं मौसी है माँ तो उर्दू है ..... क्या भावार्थ है इस कथन का/ शे'र का जिसका जोर-जोर से डंका पीटा जाता है | यही भाव हैं हमारे महानुभावों के जिसमें क्या कोई गूढ़ अर्थ छुपा है...जो हिन्दी से हमें दूर करे...
कथन -२..राम मनोहर लोहिया ...हिन्दी व उर्दू को को सती व पार्वती कहते थे .....
--------या तो लोहिया जी सती और पार्वती का अर्थ व कथा से अनभिग्य थे या उर्दू व हिन्दी के वास्तविक ज्ञान से....... सती अपूर्ण थीं और पार्वती शक्ति का १०८ वाँ अवतार और सम्पूर्ण ....क्या हिन्दी व उर्दू की यही स्थिति है ??
कथन ३....लोगों में सबसे बड़ी भ्रान्ति यही है कि भाषाओं का निर्माण लोग करते हैं ...असलियत है कि भाषाओं का बनाने-बिगाडने का कार्य एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक शक्तियां करती हैं ...लेखक ..
------क्या लेखक यह समझते हैं कि ये एतिहासिक आदि लेख में वर्णित शक्तियां ...लोग नहीं हैं ...क्या वे लोगों( मनुष्य--जन --पब्लिक) द्वारा संचालित न होकर किसी पराशक्ति द्वारा संचालित होती हैं | लेखक का अभिप्रायः लोग से क्या है ? क्या लोग ( अर्थात लोक -जन ) कोई गर्हित सम्प्रदाय है ? कथन के दोनों विभागों में क्या अंतर है ?
--- लेखक पूर्ण रूप से भ्रमित प्रतीत होता है ...... हमें अपने कथन व विचार रखते समय उचित सोच-विचार करना चाहिए कि उसका सम्प्रेषणीयता क्या होगी ....
------------यही हिन्दी का दुर्भाग्य है ....
कथन १----"मैं जब उर्दू में गज़ल कहता हूँ तो हिन्दी मुस्कुराती है|
लिपट जाता हूँ माँ से तो, मौसी मुस्कुराती है ||...."
-------अर्थात हिन्दी हमारी ( हम भारतीयों की ) माँ नहीं मौसी है माँ तो उर्दू है ..... क्या भावार्थ है इस कथन का/ शे'र का जिसका जोर-जोर से डंका पीटा जाता है | यही भाव हैं हमारे महानुभावों के जिसमें क्या कोई गूढ़ अर्थ छुपा है...जो हिन्दी से हमें दूर करे...
कथन -२..राम मनोहर लोहिया ...हिन्दी व उर्दू को को सती व पार्वती कहते थे .....
--------या तो लोहिया जी सती और पार्वती का अर्थ व कथा से अनभिग्य थे या उर्दू व हिन्दी के वास्तविक ज्ञान से....... सती अपूर्ण थीं और पार्वती शक्ति का १०८ वाँ अवतार और सम्पूर्ण ....क्या हिन्दी व उर्दू की यही स्थिति है ??
कथन ३....लोगों में सबसे बड़ी भ्रान्ति यही है कि भाषाओं का निर्माण लोग करते हैं ...असलियत है कि भाषाओं का बनाने-बिगाडने का कार्य एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक शक्तियां करती हैं ...लेखक ..
------क्या लेखक यह समझते हैं कि ये एतिहासिक आदि लेख में वर्णित शक्तियां ...लोग नहीं हैं ...क्या वे लोगों( मनुष्य--जन --पब्लिक) द्वारा संचालित न होकर किसी पराशक्ति द्वारा संचालित होती हैं | लेखक का अभिप्रायः लोग से क्या है ? क्या लोग ( अर्थात लोक -जन ) कोई गर्हित सम्प्रदाय है ? कथन के दोनों विभागों में क्या अंतर है ?
--- लेखक पूर्ण रूप से भ्रमित प्रतीत होता है ...... हमें अपने कथन व विचार रखते समय उचित सोच-विचार करना चाहिए कि उसका सम्प्रेषणीयता क्या होगी ....
------------यही हिन्दी का दुर्भाग्य है ....
रविवार, 12 अगस्त 2012
छिद्रान्वेषण ......यह बिजिनेस मेनेजमेंट है.... डा श्याम गुप्त ....
आज कल घर घर में एम् बी ए के स्कूल खुल रहे हैं और हर व्यक्ति मेनेजर बनने का ख्वाव देखता है .... सफाई प्रवंधन मेनेजर ही क्यों न हो .... मेनेजमेंट का ज़माना है ...छोले-पकौड़ी या कपडे , जूते, कुर्सी-मेज बेचने वाला हो या घर-घर पर साबुन-सर्फ़ ...सब मेनेजर हैं | यह मेनेजमेंट है क्या .... किसी भी भांति से अपना सामान बेचना......देखिये ...चित्र में...
१---कीमत --४००००/-( और बेईमानी की इंतिहा है कीमत ..३९९९९ /- लिखना ..क्या हम इतने मूर्ख हैं ?) जिसकी कीमत १०००० /- से अधिक् नहीं होगी ....फ्री में १४००० के आइटम ..जिनकी कीमत ४००० /- से अधिक नहीं होगी .....अर्थात १४००० का माल ४००००/- में |
२-- कीमत --३२०००/-( ३१९९९/-/) जो १००००/- से अधिक की नहीं है ...फ्री में २१०००/- का आइटम जो ६००० /- से अधिक का नहीं होगा ....अर्थात ....आप ही सोचें ...क्यों बिजेंनेस-में वारे-न्यारे होते हैं.... कहाँ से , कैसे कालाधन पैदा होता है ......यह बाजारवाद है...बाज़ार का धर्म....
--- क्या सिखा रहे हैं हम अपने नौनिहालों को ..शुरू से ही .झूठ, बेईमानी , टेक्स चोरी ..स्कूल-कालेजों से ही ...वे बड़े होकर क्या करेंगे .....
---- ऐसे समाज, सरकार, वर्ग से हम क्या आशा करें .....और क्यों करें ....
.................................................................. मस्त राम मस्ती में , आग लगे बस्ती में ...........
झूठा विज्ञापन करें , सबसे अच्छा माल |
देकर गिफ्ट, इनाम बस, ग्राहक करें हलाल |
झूठ काम की लूट है, लूट सके तो लूट |
तू पीछे रह जाय क्यों, सभी पड़े हैं टूट |
तेल-पाउडर बेचते, झूठ बोल इतरायं |
बड़े महानायक बने, मिलें लोग हरषायं |
साबुन क्रीम औ तेल को, बेच रहीं इतराय |
झूठे विज्ञापन करें , हीरोइन कहलायं |
सोमवार, 16 जुलाई 2012
छिद्रान्वेषण --- अकर्म..अनाधिकार कर्म.... डा श्याम गुप्त...
१------------व्यर्थ के कार्यों व उनसे सेलिब्रिटी बनने के अकर्म का यह हश्र होता है ...संसार का क्या है हंस-सुन कर अपने काम से..... परन्तु अपने कर्मों का भोग तो व्यक्ति को स्वयं भोगना पडता है ..मरने के बाद भी जग-हँसाई व अपमान द्वारा.....
२- अपनी क्षमता से अधिक ऊंचा उड़ने की ख्व्वाहिश व दूसरों के सहारे उठने व उड़ने की आकांक्षा ..व्यर्थ के कार्य ...अकर्म ...होती है | इसका अधिकाँश परिणाम यही होता है-----
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