रविवार, 13 नवंबर 2011

छिद्रान्वेषण -----तरक्की का नया नज़रिया ....पढाई आवश्यक नहीं ......डा श्याम गुप्त ..

छिद्रान्वेषण -----


               आखिर क्या कहना चाहते हैं हम ....इस प्रकार के आलेख रूपी  समाचार से.......क्या समझाना चाहते हैं नई पीढी को...कोमल माटी -तन- मन बच्चों को  ....क्या सन्देश देना चाहते हैं......की क्लास बंक करें , पढाई बीच में छोड़कर अन्य सब्ज-बागों  में मन लगाएं ...... नियमित -व पूरी स्कूली-कालि ज की शिक्षा का कोइ लाभ नहीं है......

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

आज का छिद्रान्वेषण.....राष्ट्रपति...महिलायें व समाज..... डा श्याम गुप्त.....

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
           

बिंदु-१ .....           महिलायें  सामाजिक बुराई के खिलाफ आगे आयें ....निश्चय ही अच्छा नारा है .....परन्तु यदि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च स्तर की महिलायें  अपना नाम ... प्रतिभा  देवीसिंह पाटिल....एवं अभी हाल में ही चिकित्सा वि विद्यालय की कुलपति पद पर सुशोभित ...डा सरोज चूडामणि  गोपाल ..... अर्थात ....पति (..देवीसिंह ...व गोपाल) के नाम ....के बिना अपनी स्वतंत्र  पहचान ( आइडेंटिटी ) नहीं स्थापित कर सकती हैं तो ......हम क्या अपेक्षा रखें स्वयं महिलाओं से .?? ........क्या यह नाम -स्वरुप ...प्रेम व समर्पण के वशीभूत रखा जाता है  या पारिवारिक, परम्परा व पति के दबाव स्वरुप .....?
बिंदु-२.....               क्या माननीय राष्ट्रपति महोदया ...या हिन्दी प्रदेश के ह्रदय प्रदेश की माननीय मुख्य मंत्री  या वे सभी महान महिलायें, महिला संगठन , महिला कालेज के पदाधिकारी व छात्र-संगठन , महान पूर्व छात्राएं व महान छात्राएं .......उदघाटन पट्ट को देश की भाषा  राष्ट्र-भाषा हिन्दी में नहीं करा सकती थीं जो गुलामी की प्रतीक भाषा अंग्रेज़ी में लिखा गया |

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

छिद्रान्वेषण ------ कौन महत्वपूर्ण है ....डा श्याम गुप्त.....


  छिद्रान्वेषण------                              
------- कौन महत्वपूर्ण है आपके लिए.....अखवार के लिए ..??????


शाहरुख - करीना - सिनेमा का विज्ञापन --जिनका चित्र समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर पूरे पेज पर है...............


              या ..............................
  




श्री कृष्ण ----जिनका चित्र दूसरे पेज पर है ...चौथाई  पृष्ठ पर  है ......
                                                                                                                                                                                                                          

एवं .......



राउडी राठौर .....जिसका चित्र पूरे पृष्ठ पर है ......



या.....
प्रदेश  की मुख्यमंत्री ....जिनका चित्र अंदर के पेज पर .....चौथाई  पृष्ठ पर है .....

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

आज का छिद्रान्वेषण ....दीप-पर्व एवं पटाखे व आतिशबाजी और प्रदूषण ....डा श्याम गुप्त ..

              आजकल  यह ट्रेंड बन् चला है कि ज़रा सा--- तथाकथित वैज्ञानिक विचार वाला व्यक्ति, समूह , संस्था कुछ पाश्चात्य बातें पढ़ता है ..विशेषकर यदि वे हिन्दू व भारतीय संस्कारों , रीति-रिवाजों, पर्वों , विधियों के बारे में हैं तो--- तुरंत उनमें खामियां निकालने लगते हैं एवं बुराई की भांति  प्रचार करने में जुट जाते हैं | अभारतीय संस्कृति वाले लोग तो इसमें सम्मिलित होते ही हैं ..कुछ तथाकथित आधुनिक ,स्व-संस्कृति पलायनवादी लोग भी जोर-शोर से इस में लग जाते हैं |

आतिशबाजी- सिटी हाल , बाल्टीमोर-यूं एस ऐ  ( चित्र -गूगल - साभार )
        यही बात दीप-पर्व पर पटाखों, आतिशबाजी को लेकर देखी जारही है |
                     यह एक गलत धारणा है कि आतिशबाजी से प्रदूषण होता है ....आतिशबाजी युगों से होरही है और प्रदूषण नहीं होता था ..न हुआ ..आतिशबाजी के प्रकाश, धुंए, ऊष्मा व ध्वनि और रसायनों से ( जो वातावरण के लिए एंटी-सेप्टिक का कार्य करते हैं ) से वातावरण से कीट-पतंगे ( जो इस मौसम में अधिक होते हैं)सूक्ष्म-जीव, बेक्टीरिया-आदि नष्ट होते हैंमौसम के संधि-स्थल पर मौसम के अनियमित व्यवहार (कभी गरम-कभी नरम) को सम करते हैं
                     यही कार्य सरसों के तेल के दीपक जलाने से होता है | तेल का एंटी-सेप्टिक  प्रभाव ( यज्ञ , हवं, आहुतियाँ  व होलिका दहन आदि की भांति )  वायुमंडल में वाष्पित होकर वातावरण को इन सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त करता है |  जहां मोमबत्तियाँ  व  आधुनिक विद्युत बल्ब सिर्फ प्रकाश व ऊष्मा का ही प्रभाव देते हैं ....तेल का नहीं |
                    अधिकाँश लोग बिना कुछ जाने घिसी-पिटी कहानियों को दोहराते रहते हैं ..क्योंकि यह भारतीयों का/ हिंदुओं का पावन पर्व है ...???? खतरनाक व अत्यधिक आवाज व शक्ति वाले...बड़ी-बड़ी कंपनियों में बने आधुनिक शक्तिशाली पटाखों आदि को सरकार को स्वतः ही सख्ती से बंद कर देना चाहिए |
                   जहां तक सांस के रोगी की सांस की बात है वह तो सदा ही इस मौसम के संधि-स्थल पर सामान्यतया अधिक सक्रिय हो जाती है |
                    और दुर्घटनाओं की बात-- वह तो खाना खाने से, मिलावट की मिठाइयां खाने से भी होती रहती हैं तो क्या खाना खाना बंद करदेंगे | मिलावट को बंद कीजिये ..मिठाइयों को नहीं |
            क्या दुनिया भर में, दुनिया के हर देश में  प्रतिवर्ष एवं वर्ष भर होने वाले खेलों, उत्सवों व अन्य पर्वों आदि में जो आतिशबाजी होती है ... उससे प्रदूषण नहीं होता ????
                 हमें वस्तुओं व तथ्यों को सावधानी पूर्वक चयन करना चाहिए .....अनावश्यक अति- आधुनिकता व अंधविश्वासी छद्म-वैज्ञानिकता से व उसके व्यावहारिक -चलन से सावधान रहना आवश्यक है |

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

छिद्रान्वेषण ----सजाये मौत और अल्पसंख्यक आयोग तथा गद्दाफी की ह्त्या .....डा श्याम गुप्त

  १-सजाये मौत ----                  अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष श्री हबीबुल्लाह का कथन है कि वे सजाये मौत के विरुद्ध हैं , वे उसे बर्बर युग की याद बताते हैं , वे स्वयं को बौद्ध बताते हुए वे खून्ख्खार , दुर्दम्य , ह्त्या जैसे कृत्यों के अपराधियों ,  आतंकवादियों को भी सजा के खिलाफ हैं |  मेरी समझ में नहीं आता कैसे कैसे  लोगों को आयोगों का अध्यक्ष बना दिया जाता है | जो स्वयं अल्पसंख्यक समाज से है वह तो उन्हीं के गुण गायेगा | उसे तो   आतंकवादियों में भी बौद्ध व मुस्लिम ही  नज़र आएंगे | उन्हें इन आतंकवादियों की बर्बरता संज्ञान में नहीं आती ? यदि समाज में बर्बरता का कृत्य किया जाएगा तो अपराधी के साथ भी बर्बरता होगी ही | यह सब आतंकवादियों व मुस्लिम- अपराधियों के संरक्षण का अग्रिम प्रयास है | क्या अभीतक उन्होंने कभी सजाये मौत के विरुद्ध अभियान चलाया ? अचानक अब यह सब कैसे याद आने लगा ?
                      शास्त्रों का कथन है कि  " शठे शाठ्यं समाचरेत "   एवं  साम दाम विभेद व दंड ..जो चार नीतियां है व्यष्टि व समष्टि  के अपराधों को रोकने की ...उनमें दंड एक प्रमुख नीति है .. जो दुर्दम्य व इस प्रकार के आपराधिक कृत्यों के विरुद्ध करनी चाहिए | परन्तु हबीबुल्ला जी को क्या पता शास्त्रीय तथ्य ...
                    जहां तक बौद्ध धर्म का सवाल है ...प्रसंगवश यह भी बता दिया जाय कि इसी भ्रमात्मक अहिंसा नीति के कारण बौद्ध धर्म विश्व से तिरोहित हुआ | अहिंसा जैसे दैवीय सद्गुण की किस प्रकार विकृति होती है ? बौद्ध व जैन धर्म वालों ने शास्त्रीय वाक्य के प्रथम भाग "अहिंसा परमो धर्म "  को तो अपना लिया परन्तु द्वितीय भाग  " धर्म हिंसा तथैव च .."  को भुला दिया | अर्थात धर्मार्थ ( राज्य, क़ानून, न्याय, सामाजिक के  व्यापक हित ) की गयी हिंसा , हिंसा नहीं होती अपितु आवश्यक होती है |
                   इसी भ्रामक अहिंसा वृत्ति के कारण --- जब मुसलिम आक्रमणकारियों ने गांधार (कंधार) और सिंध पर आक्रमण किया तब जनता ने अपने को 'बौद्घ' कहकर युद्घ करने से इनकार किया। मुहम्मद-बिन-कासिम ने सब प्रदेश जीता। राजा दाहिर को बंदी बनाकर मार डाला और भीषण नरसंहार किया। इस पाप की दोषी तो वहां की बौद्घ जनता थी, जो अहिंसा व्रत के कारण युद्घ से विरत रही एवं   जनता ने सम्राट का साथ देने से इनकार कर दिया|   अन्य  उदाहरण भारत की पश्चिमी सीमा पर हुए इसलामी आक्रमणों की कहानियां हैं |
         संसार के इतिहास में अनेकों बार बर्बर व्यक्तियों व जातियों ने अपने से सभ्य लोगों का विनाश कर डाला है ।  मूलतः'बर्बर मुसलिम आक्रमण ही बौद्घ मत के समूल उच्छेद का कारण बने।'
                       
                    क्या हम,  हमारी सरकार,  हबीबुल्लाह कुछ सबक लेंगे??


 २- गद्दाफी की ह्त्या---  कौन नहीं जानता कि लीबिया के शासक कर्नल मोहम्मद उमर गद्दाफी ने सत्ता में आते ही  तेल की सभी विदेशी कंपनियों को निकाल बाहर किया था जो देश का धन लूट कर बाहर लेजाती थीं एवं देश को अत्यधिक हानि सहनी पड रही थी | इससे कुछ वर्षों में ही लीबिया की अर्थ व्यवस्था तेजी से उन्नति की ओर अग्रसर हुई | इसीलिये गद्दाफी अमेरिका व योरोपीय शासकों की आँखों की किरकिरी बने हुए थे | यह राजनैतिक- कूटनीतिक चाल व राजनैतिक ह्त्या थी, जिसमें देश के ही कुछ विरोधी समूह दुश्मनों से मिल जाते हैं इसीलिये सुनियोजित योजनानुसार पहले शासक को अत्याचारी, विलासी आदि प्रचारित किया जाता है फिर उसकी ह्त्या करने के षडयंत्र ताकि अपनी कठपुतली सरकार बना कर अपना उल्लू सीधा किया जा सके |

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

छिद्रान्वेषण ----ये कहाँ जारहे हैं हम......ड़ा श्याम गुप्त ...


ये कहाँ जारहे हैं हम......

                                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                       प्रायः प्रगतिवादी विज्ञजन आंग्ल संस्कृति/ वैचारिक प्रभाव वश ..पोज़िटिव  थिंकिंग, आधे भरे गिलास को देखो ....आदि कहावतें कहते पाए जाते हैं  ...परन्तु गुणात्मक ( धनात्मक + नकारात्मक ) सोच ..सावधानी पूर्ण सोच होती है..जो आगामी व वर्त्तमान खतरों से आगाह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |  देखिये  आज के छिद्रान्वेषण  ....
१-  वैज्ञानिक व प्रगतिवादी समाज का असत्याचरण ----अभी तक तो हम सिगरेटों के पैकों / विज्ञापनों पर छोटे छोटे महीन अक्षरों में  .." सिगरेट / तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है"....के विज्ञापन देकर ही अपनी कर्तव्य की इतिश्री मानते रहे हैं........   अब देखिये इस विज्ञापन को ...न्यूनतम ई एम् आई १७२५  बड़े अक्षरों में और प्रति लाख छोटे में --क्या इससे कार की न्यूनतम किश्त १७२५/ का भ्रम  नहीं होता | बहुत छोटे अक्षरों में ...नियम व शर्तें लागू ...भी लिखा होगा .....क्यों ?? क्या यह धोखा देने की मूल नीयत नहीं प्रदर्शित होती.....कहाँ है सरकारी नियामक तंत्र...सामाजिक संस्थाएं.....समाचार पत्रों का सामाजिक दायित्व ...
            माना कि यह व्यावसायिक मेनेजमेंट -कौशल है....उन्हें अपनी कार बेचनी है ...इसीलिये तो बाज़ार में पूंजी लगाकर बैठे हैं......पर क्या उनका कोई सामाजिक दायित्व नहीं .....फिर नटवर लाल ,  बेईमानी में पकडे जाने वाले उठाईगीरे  व इनमें क्या अंतर है ......हम सोचेंगे ???
२- साहित्यिक  जगत में --दायित्वहीन, विचारहीन  सोच के कुछ उदाहरण ----
       एक-कवि सम्मलेन में कोई कवि . पढते हैं------
                             "राम तो बस चुनाव जीतने के लिए भुनाए जाते हैं,
                              रावण तो जलाकर भी सैकड़ों चूल्हे जला जाते हैं ||"  ----- क्या यह राजनैतिक पक्षधरता का साहित्य नहीं है, क्या यह  सदियों की , जन जन की आस्था पर प्रहार नहीं है , क्या आप रावण को राम के ऊपर प्रश्रय देना चाहते हैं ??   इसी प्रकार एक और कवि  पढते हैं---
                               राजनीति हमारे देश का राष्ट्रीय उद्योग है ,
                              जनता की आशाओं पर रेत के महलों का अजूबा प्रयोग है ||........क्या हम बिना राजनीति के देश चलाना चाहते हैं ...क्या यह संभव है ?.... एसी कवितायें सामयिक वाह  वाह --तालियां  तो बटोर सकती हैं पर सामाजिक दायित्व से परे अनास्था उत्पन्न करती हैं | .आखिर इन सब अतार्किकताओं से जन जन का संस्थाओं पर  अनास्था, अविश्वास  उत्पन्न करके हम क्या पाना चाहते हैं ---
      दो--केसर कस्तूरी ---कथा वाचन में --बेटी कहती है ---"राजा जनक ने सीता को दुःख सहने के लिए छोड़ दिया था | यही औरतों का भाग्य है |".......सुनने में बड़ा भावुक-करुण  लगता है ... इसे अपराध बोध की कहानी व स्त्री विमर्श ..कहा जाता रहा  है पर यह हमें कहाँ लिए जारहा है....... क्या चाहती हैं महिलायें / तथाकथित प्रगतिशील समाज / साहित्यकार ......क्या जनक सीता को राम के साथ जाने देने की अपेक्षा ...स्वयं अपने महलों में रखलेते ......क्या हम चाहते हैं कि जिस पत्नी/ नारी  ने सुख के दिनों में ...जिस पुरुष /पति के साथ मज़े  लिए, सुख भोग किया ...वह दुःख के दिनों में पिता के घर ...आनंद भोगे और पति को जंगल में दुःख सहने को छोड़ दे ...बिना  उसके किसी कसूर के....
    तीन--लन्दन में स्थापित --प्रगतिशील लेखक मंच --का कथन है कि वामपंथी विचारधारा से ही छोटे छोटे शहरों के  महत्वपूर्ण लेखकों का निर्माण व विकास हुआ है...उदाहरण---सज्जाद ज़हीर , फैज़, जोश, फिराक, सरदार जाफरी, ताम्बा , साहिर, कैफी आज़मी , कृष्ण चंदर, मंटो, नागार्जुन, मुक्तिबोध , केदार नाथ , त्रिलोचन, यशपाल ,नंबर सिंह ...आदि ..भारतीय  विचार धारा के विरोधी ....विदेशी वामपंथी सोच के साहित्यकार ही साहित्यकार  हैं...... भारतीय विचार धारा के साहित्यकारों --मैथिली शरण गुप्त, निराला, दिनकर, महादेवी, प्रसाद, की कोई अहमियत नहीं है, न आज के भारतीय विचार धारा पर लिखे जारहे साहित्य -साहित्यकारों ने कुछ किया है..........तो फिर आज जन-समाज में साहित्य व कविता के प्रति अरुचि का   कारण कहाँ स्थित है .....शायद इसी  प्रगतिशीलता की जिद में  स्व-समाज..संस्कृति, सदियों से प्रतिष्ठित भारतीय संस्कृति के  पतनोन्नयन में ....
                         ये सारे कारण, साहित्यिक / सामाजिक अवैचारिकता , अतार्किकता ,  मूल्यहीनता -- समाज में जन जन को भ्रम,अतार्किकता, अवैचारिकता, अनास्था , मूल्यहीनता की  स्थिति में डालते हैं....और जन जन-- साहित्य, सामाजिकता,  नैतिकता  से आस्थाहीन होकर ..उससे दूर होकर ...फिर उसी सदा  सुलभ भौतिकता के चरणों में जा बैठता है .....शान्ति खोजने लगता है ...अनाचरण ...भ्रष्ट-आचरण ...व  आज के द्वंद्वों का यही मूल कारण है ||

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

कविता लेखन ....मूल प्रारंभिक रूप-भाव......ड़ा श्याम गुप्त....

                    ब्लॉग जगत में स्वतंत्र अभिव्यक्ति हेतु मुफ्त लेखन की सुविधा होने से अनेकानेक  ब्लॉग आरहे हैं एवं नए नए  व युवा कवि अपने आप  को प्रस्तुत कर रहे हैं ....हिन्दी व भाषा एवं  समाज के लिए गौरव और प्रगति-प्रवाह की बात है ......परन्तु इसके साथ ही यह भी प्रदर्शित होरहा है कि .....कविता में लय, गति , लिंगभेद, विषय भाव का गठन, तार्किकता, देश-काल, एतिहासिक तथ्यों की अनदेखी  आदि  की जारही है |  जिसके जो मन में आरहा है तुकबंदी किये जारहा है | जो काव्य-कला में गिरावट का कारण बन सकता है|
                         यद्यपि कविता ह्रदय की भावाव्यक्ति है उसे सिखाया नहीं जा सकता ..परन्तु भाषा एवं व्याकरण व सम्बंधित विषय का उचित ज्ञान काव्य-कला को सम्पूर्णता प्रदान करता है |  शास्त्रीय-छांदस कविता में सभी छंदों के विशिष्ट नियम होते हैं अतः वह तो काफी बाद की व अनुभव -ज्ञान की बात है  परन्तु प्रत्येक नव व युवा कवि को कविता के बारे में कुछ सामान्य ज्ञान की छोटी छोटी मूल बातें तो आनी  ही चाहिए |   कुछ  सहज सामान्य प्रारंभिक बिंदु  नीचे दिए जा रहे हैं, शायद नवान्तुकों व अन्य जिज्ञासुओं के लिए सार्थक हो सकें ....
             (अ) -अतुकांत कविता में- यद्यपि तुकांत या अन्त्यानुप्रास नहीं होता परन्तु उचित गति, यति  व लय अवश्य होना चाहिए...यूंही कहानी या कथा की भांति नहीं होना चाहिए.....वही शब्द या शब्द-समूह बार बार आने से सौंदर्य नष्ट होता है....यथा ..निरालाजी की प्रसिद्ध कविता.....
"अबे सुन बे गुलाव ,
भूल  मत गर पाई, खुशबू रंगो-आब;
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा -
कैपीटलिस्ट ||"


          (ब )- तुकांत कविता/ गीत आदि  में--जिनके अंत में प्रत्येक पंक्ति  या पंक्ति युगल आदि में (छंदीय गति के अनुसार)  तुक या अन्त्यानुप्रास समान होता है...
-- मात्रा -- तुकांत कविता की प्रत्येक पंक्ति में सामान मात्राएँ होनी चाहिए मुख्य प्रारंभिक वाक्यांश, प्रथम  पंक्ति ( मुखडा ) की मात्राएँ गिन कर  उतनी ही सामान मात्राएँ प्रत्येक पंक्ति में रखी जानी चाहिए....यथा ..

 "कर्म      प्रधान      जगत      में    जग   में,  =१६ मात्राएँ 
 (२+१ , १+२+१ ,  १+१+१ ,  २ ,  १+१ , २  =१६)
  प्रथम       पूज्य    हे     सिद्धि     विनायक  |  = १६.
(१+१ +१,  २+१,    २ ,   २+१ ,     १+२+१+१   =१६ )

  कृपा       करो       हे       बुद्धि      विधाता ,         = १६ 
(१+२ ,   १+२ ,     २ ,      २+१     १ +२ +२     =१६  )

 रिद्धि       सिद्धि      दाता         गणनायक ||   =  १६
(२+१,      २+१ ,     २+२ ,       १+१+२+१+१  =१६ )

-लिंग ( स्त्रीलिंग-पुल्लिंग )---कर्ता व कर्मानुसार.....उसके अनुसार उसी  लिंग का प्रयोग हो.... यथा ....
       " जीवन  हर वक्त लिए एक छड़ी होती  है "  ----यहाँ  क्रिया -लिए ..कर्ता  जीवन का व्यापार   है..न कि छड़ी  का  जो समझ कर  'होती है '  लिखा गया ----अतः या तो ....जीवन हर वक्त लिए एक छड़ी होता है ....होना चाहिए ...या  ..जिंदगी  हर वक्त लिए एक छड़ी होती है ...होना चाहिए |
- इसी प्रकार ..काव्य- विषय का --काल-कथानक का समय  (टेंस ), विषय-भाव ( सब्जेक्ट-थीम ), भाव (सब्सटेंस), व  विषय क्रमिकता,  तार्किकता , एतिहासिक तथ्यों की सत्यता,  विश्व-मान्य सत्यों-तथ्यों-कथ्यों  ( यूनीवर्सल ट्रुथ ) का ध्यान रखा जाना चाहिए....बस .....|
४-- लंबी कविता में ...मूल कथानक, विषय -उद्देश्य , तथ्य व देश -काल  ....एक ही रहने चाहिए ..बदलने नहीं चाहिए .....उसी मूल कथ्य व उद्देश्य को विभिन्न उदाहरणों व कथ्यों से परिपुष्ट करना एक भिन्न बात है ...जो विषय को स्पष्टता प्रदान करते  हैं  ....

                           -और सबसे बड़ा नियम यह है कि ...स्थापित, वरिष्ठ, महान, प्रात: स्मरणीय ...कवियों की सेकडों  रचनाएँ  ..बार बार पढना , मनन करना  व उनके कला व भाव का अनुसरण करना .......उनके अनुभव व रचना पर ही बाद में आगे शास्त्रीय नियम बनते हैं......