रविवार, 4 मार्च 2012

आज का छिद्रान्वेषण---

" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है, इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(fault finding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं। प्रस्तुत है  आज का छिद्रान्वेषण---
१. अशोक स्तम्भ का अपमान और रेलवे ...
 ----- यह तो ठीक ही है...इस अपमान से बचना चाहिए हम सब को , सरकारी संस्थानों का अपराध तो अक्षम्य है ।
---परन्तु यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में किसी ने आजतक ऐसी टू , थ्री  कोचों में इन टायलेट पेपरों को कभी देखा है , प्रयोग किया है ....?????
२.क्या  होलिका दहन शव-दाह का प्रतीक है  .....अब देखिये सामने के समाचार में , क्या कहा जारहा है....तथाकथित आचार्य जो १००००० पेड़ लगाने की मुहिम चलाये हुए हैं । ऐसे अज्ञानी जन आचार्य बन कर आयेंगे तो यही होगा कि १००००० लाख पेड़ लगाने की व्यर्थ की  मुहिम चलाकर अपना नाम कमाएंगे ..बस...जो कहीं   भी नहीं दिखाई देंगे ....आखिर यूंही स्कूल--लान, पार्कों में पेड़ लगाने से क्या होगा?  वहां तो संस्थानों के माली आदि होते ही हैं ..पेड़ भी लगाए होते हैं ....पेड़ों की भीड़ लगाकर क्या हासिल होना है....
                  आगे देखिये ..पार्कों , खाली प्लाट , रेलवे लाइन के किनारे होली जलाई जाय  ...
बताइये  यह उचित है....रेलवे लाइन के किनारे होली दहन या इंजिन-ट्रेन दहन.....पब्लिक का पटरियों पर कटन.....वाह ! ....पार्कों को  होली दहन से बर्बाद कराने का इरादा है क्या ?
......बस्ती में खाली प्लाट के  आसपास  प्राय: दूसरे घर होते हैं ...और  शहर से बाहर होली-दहन का कोई अर्थ ही नहीं ।
---------------ऐसी सारी बातें किसी भी अच्छे मुहिम पर पानी फेर सकती हैं....
                

शनिवार, 3 मार्च 2012

आज का छिद्रान्वेषण----साहित्यकार -पत्रकार ..साहित्य..कविता --कवि...


" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है, इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(fault finding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं। प्रस्तुत है  आज का छिद्रान्वेषण---
 
 १-   देखिये सामने वाले समाचार में -- हिन्दी के साहित्यकार -पत्रकार भारत की सांस्कृतिक वैविध्य बचाने के लिए काम होरहा है ...अंग्रेज़ी भाषा में ...' द कंटेसटेड ग्राउंड ऑफ़ कल्चर" विषय पर ।

----वस्तुतः आजकल हर एरा-गेरा पत्रकार , पत्रिका -मैगजीन छापने वाला भी साहित्यकार बन गया है अतः साहित्य में  कूड़े तो आना  ही है .... हम अपना साहित्य , भाषा व संस्कृति ..अंग्रेज़ी में बहस करके बचायेंगे ??????

2--अब  कविता --कवियों  को  लें .....देखिये साथ के समाचार को.....बिना तलवार कोई सिकंदर बोलता है क्या ....जिस्म को उतार दीजिए तब किसी से प्यार कीजिए ....कोइ शायर मुहब्बत में संभालकर बोलता है क्या ..नींद के मारे हम ठहरे बंजारे...अगर मतलब साढ़े कोइ गधे को बाप कहते हैं .....
-----आप ही बताएं यह कौन सी साहित्यक भाषा है व कौन सा साहित्य है, क्या अर्थ हैं इन पंक्तियों के ....???

३- अब एक और उदाहरण देखिये पत्रकार-साहित्यकारों -समाचार पत्रों के सामाजिक दायित्व का .....निम्न चित्र में   
--------------  आपका साइज़ क्या है ...यह कौन सी भाषा है....आप ही सोचिये.....अब आगे क्या रह गया है .... क्या पैसे के लिए अब न्यूड - मैथुन-रत चित्र ..विज्ञापन ..समाचार भी खुले आम प्रकाशित होंगे पत्रों में ...?????????..... कहाँ जारहे हैं हम...हमारा साहित्य...साहित्यकार -पत्रकार ..????????