प्रायः प्रगतिवादी विज्ञजन, आंग्ल संस्कृति/ वैचारिक प्रभाव वश ..पोज़िटिव थिंकिंग,आधे भरे गिलास को देखो ....आदि कहावतें कहते पाए जाते हैं ...परन्तु गुणात्मक ( धनात्मक + नकारात्मक ) सोच ..सावधानी पूर्ण सोच होती है..जो आगामी व वर्तमान खतरों से आगाह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है...
मंगलवार, 6 नवंबर 2012
सोमवार, 1 अक्टूबर 2012
गुरुवार, 20 सितंबर 2012
हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....डा श्याम गुप्त
हिन्दी दिवस पर ...ये कौन सी भाषा है, कैसी राय है ...हिन्दी के लिए ....
कुछ आलेखों में हिन्दी के विषय में विविध मत प्रस्तुत किये गए
हैं | देखिये ...अच्छी भावना होते हुए भी किस प्रकार भाषा की गहन
भाव-समझ न होते हुए किस प्रकार के नकारात्मक भाव संप्रेषित होते हैं....चिरत-समाचार-१-तुलसी बड़े या कबीर ? |
१- चित्र समाचार -१.--नई रचनाशीलता --ज्ञानरंजन-..साहित्यकार......
--रचनाशीलता सदा ही नई होती है -ये नयी रचनाशीलता क्या होती है....... -----जितने बड़े लोग हैं सब विफल हैं,कबीर और मुक्तिबोध नाकाम हैं|.......हिन्दू समाज तुलसी दास को ही मानता है कबीर को नहीं... .....अर्थात लेखक के अनुसार कबीर बड़े हैं ..मुक्तिबोध बड़े हैं ..तुलसी नहीं
---और कबीर को कौन नहीं मानता ??साहित्यकार जी .... इस भारत में ..हिन्दू-मुसलमान सब मानते हैं...कबीर साहित्य के अनूठेपन की विरुदावलियाँ गाई जाती हैं.. तुलसी, तुलसी हैं- कबीर, कबीर .......
--- अब आप ही सोचिये | कैसी हिन्दी की, साहित्य की , देश-समाज की सेवा है यह ...
समाचार चित्र-२-शुद्ध हिन्दी ,भुस व गिद्ध |
चित्र-समाचार -२-.( आलेख-कांतिकुमार जैन , पूर्व-प्राध्यापक, लेखक )-. मल्होत्रा साहब के लिए शुद्ध हिन्दी गिद्ध है वह भी भुस से भरा हुआ .....
---और उन्हीं महोदय को ..गुलेरी जी की हिन्दी कहानी ...में लाणी होरा ... के अर्थ के लिए जर्मन तक जाना पड़ा ..होरा से ...जर्मन हर का अर्थ जोडने हेतु....
---- जबकि ऋग्वेद...अथर्व वेद में ...हारा शब्द ...आदि-शक्ति ..महामाया के लिए प्रयुक्त है ....... हारा ...राधा, सीता ,लक्ष्मी अर्थात आदि- शक्ति--आत्मा, आत्मशक्ति तथा ....हरे ..हरी ..शीघ्रता से प्रसन्न होने वाले देव....इसीलिये हरे कृष्ण ..हरे राम...कहाजाता है...अर्थात शक्ति से युक्त देवता ...श्याम या राम ....अतः होरा ..स्त्री के हेतु प्रयोग है...लाणी -होरा = लावनी, लोनी, सलोनी, सुन्दर, लाडली , प्रिय --- शक्ति-रूप, आदरणीय स्त्री-पत्नी-प्रेमिका ...... हर . हरें ....
----हर हिटलर शब्द हिटलर ने हरे राम..हरे कृष्ण से लिया होगा ...जर्मन लोग वैदिक साहित्य के ज्ञाता थे...
लाणी होरा और हर |
----शुद्ध हिन्दी और अच्छी हिन्दी में क्या अंतर है....क्या शुद्ध वस्तु अच्छी नहीं होगी ...क्या अर्थ निकालेंगे आप इस कथन का.....
समाचार-चित्र -३- अब एक व्यंगकार की भाषा का हिन्दी पर व्यंग्य देखिये ....हिन्दी राजनीति के बंदरों के हाथ पड गया वह उस्तरा है .जिससे खेलता हुआ वह सारे राष्ट्र को लुहूलुहान कर रहा है....
----अर्थात लेखक के अनुसार हिन्दी एक उस्तरा है, धार वाला हथियार ....बाल बनाने हेतु एक अस्त्र....
---वाह! क्या उपाधि है हिन्दी की ...व्यर्थ के व्यंग्य-आलेख लिखते लिखते उसी प्रकार की अनुपयुक्त भाषा भी होजाती है.....
---तभी तो कबीर ने कहा ....
"ह्रदय तराजू तौल कर तब मुख बाहर आनि |"...(..तब तू लिखना ठानि ....)......
शनिवार, 15 सितंबर 2012
अंग्रेज़ी में उपन्यास लिखिए.....अंग्रेजों के लिए और निश्चित ही बड़े -लेखक का खिताब पाइए ....डा श्याम गुप्त
समाचार-चित्र --..अंग्रेज़ी में उपन्यास लिखिए.....अंग्रेजों के लिए और निश्चित ही बड़े -लेखक का खिताब पाइए ..... देखिये ...तथाकथित प्रसिद्द ( हमें तो पता नहीं ये कब,कैसे व क्यों प्रसिद्ध हुए व किसने पड़े )..उपन्यासों आदि का नाम ..'द बेस्ट थिंग अबाउट यूं यूज '....'आई एम् एनदर यू",
'लाइसेंस टूलिव '.....'द परफेक्ट वर्ल्ड ',,,'अन्फोल्डिंग द गोडेस विदिन यूं'....
'काउंट योर चिकिंस बिफोर दे हैच '...द मंक टू सोल्ड हिज फेरारी '..
'स्टे हंगरी '......
---पता नहीं ये सब पुस्तकें किन लोगों के लिए लिखी गयी हैं...
विदेशी भाषा में और क्यों ....क्या ये हिन्दी, हिन्दुस्तान का खाने वाले लोग ,
हिन्दी में नहीं लिख सकते ...और क्यों .......???
------- ऐसे हज़ारों उपन्यास जो हिन्दी में हिन्दी लेखकों द्वारा लिखे गए हैं , उनका कोई ज़िक्र ही नहीं होता क्योंकि...वे हिन्दी जैसी बेकार भाषा में लिखते हैं और उन्हें बाज़ार का भाव ...कलम बेचना-खरीदना नहीं आता ....
'लाइसेंस टूलिव '.....'द परफेक्ट वर्ल्ड ',,,'अन्फोल्डिंग द गोडेस विदिन यूं'....
'काउंट योर चिकिंस बिफोर दे हैच '...द मंक टू सोल्ड हिज फेरारी '..
'स्टे हंगरी '......
---पता नहीं ये सब पुस्तकें किन लोगों के लिए लिखी गयी हैं...
विदेशी भाषा में और क्यों ....क्या ये हिन्दी, हिन्दुस्तान का खाने वाले लोग ,
हिन्दी में नहीं लिख सकते ...और क्यों .......???
------- ऐसे हज़ारों उपन्यास जो हिन्दी में हिन्दी लेखकों द्वारा लिखे गए हैं , उनका कोई ज़िक्र ही नहीं होता क्योंकि...वे हिन्दी जैसी बेकार भाषा में लिखते हैं और उन्हें बाज़ार का भाव ...कलम बेचना-खरीदना नहीं आता ....
...त्रुटिपूर्ण सोच के कथन और हिन्दी का दुर्भाग्य ...डा श्याम गुप्त
लम्हों ने खता की और सदियों ने सज़ा पाई .....यही
हाल है हिन्दी का भी...प्रायः अच्छे भाव होते हुए भी कथन में
.....त्रुटिपूर्ण विचार-भाव के कारण वह भाव-सम्प्रेषण नहीं होपाता जो
होना चाहिए ...अतः हिन्दी आज उतनी तेजी से प्रगति पथ पर अग्रसर नहीं हो
पारही जितना उसे होना चाहिए.....देखिये कुछ असम्प्रक्त व अस्पष्ट विचार भाव
.....( उपरोक्त चित्र-समाचार में आलेख..)
कथन १----"मैं जब उर्दू में गज़ल कहता हूँ तो हिन्दी मुस्कुराती है|
लिपट जाता हूँ माँ से तो, मौसी मुस्कुराती है ||...."
-------अर्थात हिन्दी हमारी ( हम भारतीयों की ) माँ नहीं मौसी है माँ तो उर्दू है ..... क्या भावार्थ है इस कथन का/ शे'र का जिसका जोर-जोर से डंका पीटा जाता है | यही भाव हैं हमारे महानुभावों के जिसमें क्या कोई गूढ़ अर्थ छुपा है...जो हिन्दी से हमें दूर करे...
कथन -२..राम मनोहर लोहिया ...हिन्दी व उर्दू को को सती व पार्वती कहते थे .....
--------या तो लोहिया जी सती और पार्वती का अर्थ व कथा से अनभिग्य थे या उर्दू व हिन्दी के वास्तविक ज्ञान से....... सती अपूर्ण थीं और पार्वती शक्ति का १०८ वाँ अवतार और सम्पूर्ण ....क्या हिन्दी व उर्दू की यही स्थिति है ??
कथन ३....लोगों में सबसे बड़ी भ्रान्ति यही है कि भाषाओं का निर्माण लोग करते हैं ...असलियत है कि भाषाओं का बनाने-बिगाडने का कार्य एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक शक्तियां करती हैं ...लेखक ..
------क्या लेखक यह समझते हैं कि ये एतिहासिक आदि लेख में वर्णित शक्तियां ...लोग नहीं हैं ...क्या वे लोगों( मनुष्य--जन --पब्लिक) द्वारा संचालित न होकर किसी पराशक्ति द्वारा संचालित होती हैं | लेखक का अभिप्रायः लोग से क्या है ? क्या लोग ( अर्थात लोक -जन ) कोई गर्हित सम्प्रदाय है ? कथन के दोनों विभागों में क्या अंतर है ?
--- लेखक पूर्ण रूप से भ्रमित प्रतीत होता है ...... हमें अपने कथन व विचार रखते समय उचित सोच-विचार करना चाहिए कि उसका सम्प्रेषणीयता क्या होगी ....
------------यही हिन्दी का दुर्भाग्य है ....
कथन १----"मैं जब उर्दू में गज़ल कहता हूँ तो हिन्दी मुस्कुराती है|
लिपट जाता हूँ माँ से तो, मौसी मुस्कुराती है ||...."
-------अर्थात हिन्दी हमारी ( हम भारतीयों की ) माँ नहीं मौसी है माँ तो उर्दू है ..... क्या भावार्थ है इस कथन का/ शे'र का जिसका जोर-जोर से डंका पीटा जाता है | यही भाव हैं हमारे महानुभावों के जिसमें क्या कोई गूढ़ अर्थ छुपा है...जो हिन्दी से हमें दूर करे...
कथन -२..राम मनोहर लोहिया ...हिन्दी व उर्दू को को सती व पार्वती कहते थे .....
--------या तो लोहिया जी सती और पार्वती का अर्थ व कथा से अनभिग्य थे या उर्दू व हिन्दी के वास्तविक ज्ञान से....... सती अपूर्ण थीं और पार्वती शक्ति का १०८ वाँ अवतार और सम्पूर्ण ....क्या हिन्दी व उर्दू की यही स्थिति है ??
कथन ३....लोगों में सबसे बड़ी भ्रान्ति यही है कि भाषाओं का निर्माण लोग करते हैं ...असलियत है कि भाषाओं का बनाने-बिगाडने का कार्य एतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक शक्तियां करती हैं ...लेखक ..
------क्या लेखक यह समझते हैं कि ये एतिहासिक आदि लेख में वर्णित शक्तियां ...लोग नहीं हैं ...क्या वे लोगों( मनुष्य--जन --पब्लिक) द्वारा संचालित न होकर किसी पराशक्ति द्वारा संचालित होती हैं | लेखक का अभिप्रायः लोग से क्या है ? क्या लोग ( अर्थात लोक -जन ) कोई गर्हित सम्प्रदाय है ? कथन के दोनों विभागों में क्या अंतर है ?
--- लेखक पूर्ण रूप से भ्रमित प्रतीत होता है ...... हमें अपने कथन व विचार रखते समय उचित सोच-विचार करना चाहिए कि उसका सम्प्रेषणीयता क्या होगी ....
------------यही हिन्दी का दुर्भाग्य है ....
रविवार, 12 अगस्त 2012
छिद्रान्वेषण ......यह बिजिनेस मेनेजमेंट है.... डा श्याम गुप्त ....

आज कल घर घर में एम् बी ए के स्कूल खुल रहे हैं और हर व्यक्ति मेनेजर बनने का ख्वाव देखता है .... सफाई प्रवंधन मेनेजर ही क्यों न हो .... मेनेजमेंट का ज़माना है ...छोले-पकौड़ी या कपडे , जूते, कुर्सी-मेज बेचने वाला हो या घर-घर पर साबुन-सर्फ़ ...सब मेनेजर हैं | यह मेनेजमेंट है क्या .... किसी भी भांति से अपना सामान बेचना......देखिये ...चित्र में...
१---कीमत --४००००/-( और बेईमानी की इंतिहा है कीमत ..३९९९९ /- लिखना ..क्या हम इतने मूर्ख हैं ?) जिसकी कीमत १०००० /- से अधिक् नहीं होगी ....फ्री में १४००० के आइटम ..जिनकी कीमत ४००० /- से अधिक नहीं होगी .....अर्थात १४००० का माल ४००००/- में |
२-- कीमत --३२०००/-( ३१९९९/-/) जो १००००/- से अधिक की नहीं है ...फ्री में २१०००/- का आइटम जो ६००० /- से अधिक का नहीं होगा ....अर्थात ....आप ही सोचें ...क्यों बिजेंनेस-में वारे-न्यारे होते हैं.... कहाँ से , कैसे कालाधन पैदा होता है ......यह बाजारवाद है...बाज़ार का धर्म....
--- क्या सिखा रहे हैं हम अपने नौनिहालों को ..शुरू से ही .झूठ, बेईमानी , टेक्स चोरी ..स्कूल-कालेजों से ही ...वे बड़े होकर क्या करेंगे .....
---- ऐसे समाज, सरकार, वर्ग से हम क्या आशा करें .....और क्यों करें ....
.................................................................. मस्त राम मस्ती में , आग लगे बस्ती में ...........
झूठा विज्ञापन करें , सबसे अच्छा माल |
देकर गिफ्ट, इनाम बस, ग्राहक करें हलाल |
झूठ काम की लूट है, लूट सके तो लूट |
तू पीछे रह जाय क्यों, सभी पड़े हैं टूट |
तेल-पाउडर बेचते, झूठ बोल इतरायं |
बड़े महानायक बने, मिलें लोग हरषायं |
साबुन क्रीम औ तेल को, बेच रहीं इतराय |
झूठे विज्ञापन करें , हीरोइन कहलायं |
सोमवार, 16 जुलाई 2012
छिद्रान्वेषण --- अकर्म..अनाधिकार कर्म.... डा श्याम गुप्त...
१------------व्यर्थ के कार्यों व उनसे सेलिब्रिटी बनने के अकर्म का यह हश्र होता है ...संसार का क्या है हंस-सुन कर अपने काम से..... परन्तु अपने कर्मों का भोग तो व्यक्ति को स्वयं भोगना पडता है ..मरने के बाद भी जग-हँसाई व अपमान द्वारा.....
२- अपनी क्षमता से अधिक ऊंचा उड़ने की ख्व्वाहिश व दूसरों के सहारे उठने व उड़ने की आकांक्षा ..व्यर्थ के कार्य ...अकर्म ...होती है | इसका अधिकाँश परिणाम यही होता है-----
रविवार, 27 मई 2012
सांस्कृतिक शून्यता का जिम्मेदार कौन? ....सन्दर्भ आईपीएल ... डा श्याम गुप्त...
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
श्री अभय खुरासिया का उपरोक्त आलेख निश्चय ही आखें खोलने वाला है , हमें निश्चय ही गहनता से सोचना होगा, जैसा वे कहते हैं .." जिम्मेदारी युवा पर ही क्यों डालदी जाती है | सांस्कृतिक शून्यता का जिम्मेदार कौन? हमारे
वरिष्ठ व जिम्मेदार तब कहाँ थे जब एम् टीवी, एफ टीवी,व तमाम दूषित
तस्वीरों, विचारों का आगाज़ हो रहा था | हमारे बच्चे हिंसा, मादकता ,
सनसनी को देख कर बड़े होरहे हैं| जैसे बीज बो रहे हैं वैसे ही अंकुर
फूटेंगे |" ......
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ..जहां तक मुझे अभय का चित्र व युवाओं की वकालत करने से लगता है कि वे एक युवा हैं ... अर्थात यह युवाओं का वक्तव्य है .... अपनी वरिष्ठ पीढ़ी पर उचित मार्गदर्शन न् करने हेतु ..... और यह एक कटु-सत्य भी है | .तो बात यहाँ और भी गंभीर होजाती है, तथा समाज व मानवता के लिए एक चेतावनी...खतरे की घंटी ....
इस प्रकार वे अपनी युवा -आकांक्षा व पहले वाली पीढ़ी पर आक्षेप के साथ मूलतः आई पी एल को बंद करने के विचारों पर असहमत प्रकट करते हैं |
परन्तु साथ ही साथ यद्यपि शायद अनुभव-ज्ञान की कमी के कारण उनके विभिन्न कथ्य स्वयं ही विपरीतार्थक हैं, कंट्रोवर्शियल ........यथा-----
१-वे एक तरफ कहते हैं ..."समस्या का समाधान ताला लगाने में नहीं है वरन ताला खोल सूक्ष्म शल्य क्रिया में है|"
---- परन्तु फिर ताले का आविष्कार ही क्यों हुआ ?
इसके विपरीत भाव में वे कहते हैं कि .." जब सामाजिक मापदंड ही भौतिकता है तो युवा भटकेगा ही "
.........अर्थात सामाजिक तालों की, मापदंडों की आवश्यकता है "|
२- वे एक तरफ कहते हैं .." खिलाड़ी धन के तट पर बना रहे, पर साथ ही मूल्यों के सेतु को भी मज़बूत करता चले "......वहीं दूसरी ओर कहते हैं कि..."मोह-माया से परे सोचना एक अवस्था के बाद ही आता है |"
----निश्चय ही वह अवस्था आते आते सब नष्ट होजायागा | सब कुछ गलत-सलत करलेने के बाद यदि कुछ सोचा तो क्या लाभ |
वस्तुतः यदि अनुभव व ज्ञान से सोचा जाय तो युवा लेखक भूल जाते हैं कि --मानव मन एक वायवीय तत्त्व है एवं विषयों में शीघ्र गिरता है ...जैसा कि वे स्वयं स्वीकार करते हैं ..."हमारा नैसर्गिक स्वभाव है कि हमें नकारात्मक बातें ज्यादा आकर्षित करती हैं".....अतः सर्जरी की नौबत ही क्यों आये , पहले से ही रोकथाम के उपाय होने चाहिए | "प्रीवेंशन इज बैटर देन क्योर "... जैसा कि वे पहली पीढ़ी पर दोषारोपण के साथ स्वयं ही स्वीकार करते हैं ......" .....हमारे वरिष्ठ व जिम्मेदार तब कहाँ थे जब एम् टीवी, एफ टीवी,व तमाम दूषित तस्वीरों, विचारों का आगाज़ हो रहा था | हमारे बच्चे हिंसा, मादकता , सनसनी को देख कर बड़े होरहे हैं| जैसे बीज बो रहे हैं वैसे ही अंकुर फूटेंगे |" ....... अतः निश्चय ही मानव मन को दूषित करने वाले साधनों को ही बंद कर देना चाहिए ...मूलतः वे जो किसी भी प्रकार से सामाजिक लाभ में सहायक नहीं हैं ...और अतिरिक्त आर्थिक लाभ सदैव असामाजिक होता है | अति-भौतिकता, मोह-माया उत्पन्न करता है, उसकी और खींचता है |
अतः आई पी एल जैसे ( व अन्य उल-जुलूल डांस, गायन, देह-प्रदर्शन , अदि कला व प्रगतिशीलता के नाम पर होने वाले व्यर्थ के ) आयोजनों को निश्चय ही बंद कर देना चाहिए | साथ ही साथ आज की प्रौढ़ व अनुभवी पीढ़ी को अपनी गलतियों , गलत योजनाओं , गलत आचरणों पर सोचना चाहिये व उचित समाधानार्थक उपाय करने चाहिए | अन्यथा भविष्य की पीढ़ी अपनी बर्वादी हेतु उन्हें कभी माफ नहीं करेगी |
ऑफ द फील्ड ---अभय खुरासिया का आलेख -राजस्थान पत्रिका ....संदर्भ -आईपीएल .. |
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ..जहां तक मुझे अभय का चित्र व युवाओं की वकालत करने से लगता है कि वे एक युवा हैं ... अर्थात यह युवाओं का वक्तव्य है .... अपनी वरिष्ठ पीढ़ी पर उचित मार्गदर्शन न् करने हेतु ..... और यह एक कटु-सत्य भी है | .तो बात यहाँ और भी गंभीर होजाती है, तथा समाज व मानवता के लिए एक चेतावनी...खतरे की घंटी ....
इस प्रकार वे अपनी युवा -आकांक्षा व पहले वाली पीढ़ी पर आक्षेप के साथ मूलतः आई पी एल को बंद करने के विचारों पर असहमत प्रकट करते हैं |
परन्तु साथ ही साथ यद्यपि शायद अनुभव-ज्ञान की कमी के कारण उनके विभिन्न कथ्य स्वयं ही विपरीतार्थक हैं, कंट्रोवर्शियल ........यथा-----
१-वे एक तरफ कहते हैं ..."समस्या का समाधान ताला लगाने में नहीं है वरन ताला खोल सूक्ष्म शल्य क्रिया में है|"
---- परन्तु फिर ताले का आविष्कार ही क्यों हुआ ?
इसके विपरीत भाव में वे कहते हैं कि .." जब सामाजिक मापदंड ही भौतिकता है तो युवा भटकेगा ही "
.........अर्थात सामाजिक तालों की, मापदंडों की आवश्यकता है "|
२- वे एक तरफ कहते हैं .." खिलाड़ी धन के तट पर बना रहे, पर साथ ही मूल्यों के सेतु को भी मज़बूत करता चले "......वहीं दूसरी ओर कहते हैं कि..."मोह-माया से परे सोचना एक अवस्था के बाद ही आता है |"
----निश्चय ही वह अवस्था आते आते सब नष्ट होजायागा | सब कुछ गलत-सलत करलेने के बाद यदि कुछ सोचा तो क्या लाभ |
वस्तुतः यदि अनुभव व ज्ञान से सोचा जाय तो युवा लेखक भूल जाते हैं कि --मानव मन एक वायवीय तत्त्व है एवं विषयों में शीघ्र गिरता है ...जैसा कि वे स्वयं स्वीकार करते हैं ..."हमारा नैसर्गिक स्वभाव है कि हमें नकारात्मक बातें ज्यादा आकर्षित करती हैं".....अतः सर्जरी की नौबत ही क्यों आये , पहले से ही रोकथाम के उपाय होने चाहिए | "प्रीवेंशन इज बैटर देन क्योर "... जैसा कि वे पहली पीढ़ी पर दोषारोपण के साथ स्वयं ही स्वीकार करते हैं ......" .....हमारे वरिष्ठ व जिम्मेदार तब कहाँ थे जब एम् टीवी, एफ टीवी,व तमाम दूषित तस्वीरों, विचारों का आगाज़ हो रहा था | हमारे बच्चे हिंसा, मादकता , सनसनी को देख कर बड़े होरहे हैं| जैसे बीज बो रहे हैं वैसे ही अंकुर फूटेंगे |" ....... अतः निश्चय ही मानव मन को दूषित करने वाले साधनों को ही बंद कर देना चाहिए ...मूलतः वे जो किसी भी प्रकार से सामाजिक लाभ में सहायक नहीं हैं ...और अतिरिक्त आर्थिक लाभ सदैव असामाजिक होता है | अति-भौतिकता, मोह-माया उत्पन्न करता है, उसकी और खींचता है |
अतः आई पी एल जैसे ( व अन्य उल-जुलूल डांस, गायन, देह-प्रदर्शन , अदि कला व प्रगतिशीलता के नाम पर होने वाले व्यर्थ के ) आयोजनों को निश्चय ही बंद कर देना चाहिए | साथ ही साथ आज की प्रौढ़ व अनुभवी पीढ़ी को अपनी गलतियों , गलत योजनाओं , गलत आचरणों पर सोचना चाहिये व उचित समाधानार्थक उपाय करने चाहिए | अन्यथा भविष्य की पीढ़ी अपनी बर्वादी हेतु उन्हें कभी माफ नहीं करेगी |
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012
रविवार, 4 मार्च 2012
आज का छिद्रान्वेषण---
" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है, इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(fault finding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- न कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... । मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम व हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते । आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं। प्रस्तुत है आज का छिद्रान्वेषण---
१. अशोक स्तम्भ का अपमान और रेलवे ...
----- यह तो ठीक ही है...इस अपमान से बचना चाहिए हम सब को , सरकारी संस्थानों का अपराध तो अक्षम्य है ।
---परन्तु यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में किसी ने आजतक ऐसी टू , थ्री कोचों में इन टायलेट पेपरों को कभी देखा है , प्रयोग किया है ....?????
२.क्या होलिका दहन शव-दाह का प्रतीक है .....अब देखिये सामने के समाचार में , क्या कहा जारहा है....तथाकथित आचार्य जो १००००० पेड़ लगाने की मुहिम चलाये हुए हैं । ऐसे अज्ञानी जन आचार्य बन कर आयेंगे तो यही होगा कि १००००० लाख पेड़ लगाने की व्यर्थ की मुहिम चलाकर अपना नाम कमाएंगे ..बस...जो कहीं भी नहीं दिखाई देंगे ....आखिर यूंही स्कूल--लान, पार्कों में पेड़ लगाने से क्या होगा? वहां तो संस्थानों के माली आदि होते ही हैं ..पेड़ भी लगाए होते हैं ....पेड़ों की भीड़ लगाकर क्या हासिल होना है....
आगे देखिये ..पार्कों , खाली प्लाट , रेलवे लाइन के किनारे होली जलाई जाय ...
बताइये यह उचित है....रेलवे लाइन के किनारे होली दहन या इंजिन-ट्रेन दहन.....पब्लिक का पटरियों पर कटन.....वाह ! ....पार्कों को होली दहन से बर्बाद कराने का इरादा है क्या ?
......बस्ती में खाली प्लाट के आसपास प्राय: दूसरे घर होते हैं ...और शहर से बाहर होली-दहन का कोई अर्थ ही नहीं ।
---------------ऐसी सारी बातें किसी भी अच्छे मुहिम पर पानी फेर सकती हैं....
१. अशोक स्तम्भ का अपमान और रेलवे ...
----- यह तो ठीक ही है...इस अपमान से बचना चाहिए हम सब को , सरकारी संस्थानों का अपराध तो अक्षम्य है ।
---परन्तु यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में किसी ने आजतक ऐसी टू , थ्री कोचों में इन टायलेट पेपरों को कभी देखा है , प्रयोग किया है ....?????
२.क्या होलिका दहन शव-दाह का प्रतीक है .....अब देखिये सामने के समाचार में , क्या कहा जारहा है....तथाकथित आचार्य जो १००००० पेड़ लगाने की मुहिम चलाये हुए हैं । ऐसे अज्ञानी जन आचार्य बन कर आयेंगे तो यही होगा कि १००००० लाख पेड़ लगाने की व्यर्थ की मुहिम चलाकर अपना नाम कमाएंगे ..बस...जो कहीं भी नहीं दिखाई देंगे ....आखिर यूंही स्कूल--लान, पार्कों में पेड़ लगाने से क्या होगा? वहां तो संस्थानों के माली आदि होते ही हैं ..पेड़ भी लगाए होते हैं ....पेड़ों की भीड़ लगाकर क्या हासिल होना है....
आगे देखिये ..पार्कों , खाली प्लाट , रेलवे लाइन के किनारे होली जलाई जाय ...
बताइये यह उचित है....रेलवे लाइन के किनारे होली दहन या इंजिन-ट्रेन दहन.....पब्लिक का पटरियों पर कटन.....वाह ! ....पार्कों को होली दहन से बर्बाद कराने का इरादा है क्या ?
......बस्ती में खाली प्लाट के आसपास प्राय: दूसरे घर होते हैं ...और शहर से बाहर होली-दहन का कोई अर्थ ही नहीं ।
---------------ऐसी सारी बातें किसी भी अच्छे मुहिम पर पानी फेर सकती हैं....
शनिवार, 3 मार्च 2012
आज का छिद्रान्वेषण----साहित्यकार -पत्रकार ..साहित्य..कविता --कवि...
" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है, इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(fault finding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- न कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... । मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम व हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते । आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां हैं। प्रस्तुत है आज का छिद्रान्वेषण---
१- देखिये सामने वाले समाचार में -- हिन्दी के साहित्यकार -पत्रकार भारत की सांस्कृतिक वैविध्य बचाने के लिए काम होरहा है ...अंग्रेज़ी भाषा में ...' द कंटेसटेड ग्राउंड ऑफ़ कल्चर" विषय पर ।
----वस्तुतः आजकल हर एरा-गेरा पत्रकार , पत्रिका -मैगजीन छापने वाला भी साहित्यकार बन गया है अतः साहित्य में कूड़े तो आना ही है .... हम अपना साहित्य , भाषा व संस्कृति ..अंग्रेज़ी में बहस करके बचायेंगे ??????
2--अब कविता --कवियों को लें .....देखिये साथ के समाचार को.....बिना तलवार कोई सिकंदर बोलता है क्या ....जिस्म को उतार दीजिए तब किसी से प्यार कीजिए ....कोइ शायर मुहब्बत में संभालकर बोलता है क्या ..नींद के मारे हम ठहरे बंजारे...अगर मतलब साढ़े कोइ गधे को बाप कहते हैं .....
-----आप ही बताएं यह कौन सी साहित्यक भाषा है व कौन सा साहित्य है, क्या अर्थ हैं इन पंक्तियों के ....???
३- अब एक और उदाहरण देखिये पत्रकार-साहित्यकारों -समाचार पत्रों के सामाजिक दायित्व का .....निम्न चित्र में
-------------- आपका साइज़ क्या है ...यह कौन सी भाषा है....आप ही सोचिये.....अब आगे क्या रह गया है .... क्या पैसे के लिए अब न्यूड - मैथुन-रत चित्र ..विज्ञापन ..समाचार भी खुले आम प्रकाशित होंगे पत्रों में ...?????????..... कहाँ जारहे हैं हम...हमारा साहित्य...साहित्यकार -पत्रकार ..????????
रविवार, 8 जनवरी 2012
छिद्रान्वेषण... अकर्म..व अनैतिक कर्म...डा श्याम गुप्त...
--- इसे कहते हैं ..अकर्म ...
१.-------वाह ! वाह! क्या बात है...क्या न्याय है ..लोगों को तो ओढने को मुहैया नहीं है....दो गज कपड़ा ..जानवरों की मूर्तियों को पोलीथीन की ओढनी..?
----जिस तथ्य के , अनावश्यक खर्च, के कारण आलोचना हुई उसी के कारण ,आज्ञा-पालन में वही तथ्य, अनावश्यक खर्च... .....क्या हम ..हमारी संस्थायें दूरंदेशी से कार्य कर रही हैं ......
---मुख्यमंत्री मायावती जी को आभारी होना चाहिए कि इस प्रकार उन्हें और अधिक पब्लीसिटी मिलेगी, ढकी हुई मूर्ति देख कर और अधिक लोग पूछेंगे कि ये क्या है ...और जबाव मिलेगा...बसपा का हाथी ....बहुत खूब....
----क्या चुनाव चिन्ह ’साइकल ’ का भी सडक पर, शहर में चलना /चलाना बन्द किया जायगा ...?
२- यदि आप किक होने को तैयार है, यदि आप क्लिक होना चाहते हैं तो आपको निश्चय ही... बटन खोलने होंगे ...
१.-------वाह ! वाह! क्या बात है...क्या न्याय है ..लोगों को तो ओढने को मुहैया नहीं है....दो गज कपड़ा ..जानवरों की मूर्तियों को पोलीथीन की ओढनी..?
----जिस तथ्य के , अनावश्यक खर्च, के कारण आलोचना हुई उसी के कारण ,आज्ञा-पालन में वही तथ्य, अनावश्यक खर्च... .....क्या हम ..हमारी संस्थायें दूरंदेशी से कार्य कर रही हैं ......
---मुख्यमंत्री मायावती जी को आभारी होना चाहिए कि इस प्रकार उन्हें और अधिक पब्लीसिटी मिलेगी, ढकी हुई मूर्ति देख कर और अधिक लोग पूछेंगे कि ये क्या है ...और जबाव मिलेगा...बसपा का हाथी ....बहुत खूब....
----क्या चुनाव चिन्ह ’साइकल ’ का भी सडक पर, शहर में चलना /चलाना बन्द किया जायगा ...?
२- यदि आप किक होने को तैयार है, यदि आप क्लिक होना चाहते हैं तो आपको निश्चय ही... बटन खोलने होंगे ...
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